‘सिर्फ प्रदर्शन होने से लाठीचार्ज नहीं हो सकता’, छात्र आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी; पुलिस कार्रवाई की स्वतंत्र जांच के संकेत

नई दिल्ली: हाल के छात्र आंदोलनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अहम टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि केवल आंदोलन होने के आधार पर प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने पुलिस द्वारा कथित अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों की स्वतंत्र जांच की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

छात्रों की याचिका पर सुनवाई के दौरान आई टिप्पणी

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष विभिन्न राज्यों में छात्र आंदोलनों के दौरान पुलिस कार्रवाई से जुड़ी याचिकाओं का उल्लेख किया गया। इनमें एक याचिका उन छात्रों की ओर से दायर की गई है, जिन्होंने प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा मारपीट और अत्यधिक बल प्रयोग का आरोप लगाया है।

सीवान में AK-47 इस्तेमाल के आरोप का भी हुआ जिक्र

सुनवाई के दौरान एक अन्य याचिका में बिहार के सीवान में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ AK-47 राइफलों के इस्तेमाल का भी आरोप उठाया गया। इस पर अदालत ने कहा कि पुलिस द्वारा अंधाधुंध या अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए।

जंतर-मंतर कार्रवाई को लेकर दायर हुई जनहित याचिका

जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की उच्चस्तरीय जांच की मांग को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है। इससे पहले इसी मुद्दे पर मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र भेजा गया था, जिस पर कोई संज्ञान नहीं लिया गया था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने औपचारिक रूप से अदालत का दरवाजा खटखटाया।

डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य सुरक्षित रखने की मांग

जनहित याचिका में अदालत से मांग की गई है कि संबंधित घटनाओं से जुड़े सभी इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल साक्ष्यों को तत्काल सुरक्षित रखने का निर्देश दिया जाए। इसमें सीसीटीवी फुटेज, बॉडी-वॉर्न कैमरा रिकॉर्डिंग, ड्रोन फुटेज, मोबाइल वीडियो, सोशल मीडिया सामग्री, पुलिस वायरलेस रिकॉर्ड, कॉल लॉग, कंट्रोल रूम रिकॉर्ड, तैनाती आदेश, जीपीएस रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेजी साक्ष्यों को संरक्षित करने की मांग शामिल है।

एफआईआर और निष्पक्ष जांच की भी अपील

याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि उपलब्ध रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों, मीडिया रिपोर्ट या अन्य विश्वसनीय सामग्री के आधार पर किसी पुलिस अधिकारी, लोक सेवक या अन्य प्राधिकारी द्वारा संज्ञेय अपराध का प्रथम दृष्टया मामला बनता हो, तो तत्काल एफआईआर दर्ज कर निष्पक्ष, स्वतंत्र और समयबद्ध आपराधिक जांच शुरू की जाए।

 

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